सरकार ने यह बात जम्मू में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों को हिरासत में लिए जाने और उन्हे म्यांमार भेजे जाने की तैयारी के समर्थन में कही.

केंद्र सरकार ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि यह अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं है कि वो केंद्र सरकार को उसके विदेशी संबंधों के बारे में आदेश जारी करे.

दिल्ली स्थित एक रोहिंग्या मुसलान ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी जिसपर शुक्रवार को सुनवाई हुई.

याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि जब हमें पता है कि म्यांमार में इनका नरसंहार हो सकता है तो ऐसी स्थिति में भारत कैसे इन रोहिंग्या मुसलमानों के मानवाधिकार और उनके जीने के अधिकार का सम्मान नहीं करेगा और उन्हें म्यांमार धकेल देगा?

रोहिंग्या मुसलमान

संयुक्त राष्ट्र के विशेष पदाधिकारी की तरफ़ से हस्तक्षेप अर्ज़ी दायर की गई थी लेकिन अदालत ने उसपर सुनवाई करने से इनकार कर दिया.

केंद्र की तरफ़ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि भारत ने शरणार्थी कंवेन्शन पर दस्तख़त नहीं किया है इसलिए प्रशांत भूषण की दलील का कोई क़ानूनी आधार नहीं है.

मेहता ने कहा कि सरकार म्यांमार के साथ संपर्क में है और जब वो इस बात की पुष्टि करेंगे कि कोई व्यक्ति उनका नागरिक है, तभी उस व्यक्ति को निर्वासित किया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है.

सुप्रीम कोर्ट

चुनावी बॉन्ड पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट ने किया इनकार

अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू में छपी ख़बर के अनुसार पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शरद ए बोबडे की अध्यक्षता वाली बेंच ने शुक्रवार को फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि यह योजना 2018 में शुरू हुई थी जो 2019 और 2020 में भी किसी रुकावट के चलती रही.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत ने ऐसा कोई कारण नहीं पाया है जिसके आधार पर इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री पर रोक लगाई जा सके.

एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (एडीआर) नामक एक ग़ैर-सरकारी संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर एक से 10 अप्रैल तक इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री पर रोक लगाने की अपील की थी.

एडीआर की तरफ़ से दलील रखते हुए वकील प्रशांत भूषण और नेहा राठी का कहना था कि विधानसभा चुनावों से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री से राजनीतिक पार्टियों की ग़ैर-क़ानूनी और नाजायज़ फंडिंग में और इज़ाफ़ा होगा.

सरकार का पक्ष रखते हुए एटॉर्नी जनरल ने अदालत में कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री की घोषणा चुनाव आयोग से इजाज़त लेने के बाद की गई थी.