प्रणब मुखर्जी WAS HUMAN ENCYCLOPEDIA, चलता-फिरता कंप्यूटर प्रणब मुखर्जी थे

प्रणब मुखर्जी WAS HUMAN ENCYCLOPEDIA, चलता-फिरता कंप्यूटर प्रणब मुखर्जी थे

हाइलाइट्स: पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का 84 साल की उम्र में निधन कांग्रेस के दिग्गज नेता माने जाते थे प्रणब मुखर्जीइंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री रहेप्रबनब मुखर्जी को चलता-फिरता व्यसकलापेडिया कहा जाता थानई दिल्लीप्रभान मुखर्जी नहीं रहे। इसके साथ ही पिछले 6 दशकों तक देश की सियासत का एक सबसे मजबूत पहिया भी उखड़ गया। राजनीति के दादा से लेकर सीटिजन मुखर्जी के रूप में प्रणब दादा का राजनीतिक सफर निदा फाजली के शब्दों-कभी किसी का मुकम्म्मल जहां नहीं मिलता, कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिल रही भावपूर्ण रही। जिसे चाहा वह या तो नहीं मिला या बहुत दुश्वारी से मिला। और जिसे नहीं चाहा, वह उन्हें अचानक ही मिल गया। पछास-साठ के दशक में बंगाली परिवेश में पल-बढ़ रहे प्रणब दा के मन में हसरतें बड़ी शुरुआत से थे, उनका जोश भी था। लेकिन उद्देश्य पाने की दिशा का अंदाजा नहीं था। उनका परिवार कांग्रेस से शुरू से जुड़ा रहा था। प्रणब ने पहले बतौर प्रोफेसर के साथ अपना करियर शुरू किया। फिर वह पत्रकारिता में भी आया। बंगाल में रहते हुए वह उभरती इंदिरा गांधी से बेहद प्रभावित थे। बंगाल दौरे के समय इंदिरा को प्रणब मुखर्जी में संभावनाएं दिखीं, जिसके बाद उन्हें अपनी नई टीम में जगह दी। कम समय में ही हेदिरा के सबसे करीबी नेताओं में शामिल हो गए हैं। वह मुखर्जी से इतनी प्रभावित हुईं कि कई दिग्गजों का पत्ता काटते हुए 1969 में युवा प्रणब दा को राज्यसभा सांसद बना दिया। अगले कुछ वर्षों में वह इंदिरा गांधी के साथ संजय गांधी के भी करीबी हो जाएंगे। जब जोर लगाया गया तो वह इंदिरा-संजय गांधी की कोर टीम का हिस्सा बन गए थे। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का 84 साल की उम्र में निधनजब इमर्जेंसी के बाद इंदिरा हारी तब भी वह दर्शन के साथ उनके साथ बने रहे। प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में इसका जिक्र किया है कि 1980 में इंदिरा गांधी नहीं चाहती थीं कि वह लोकसभा चुनाव लड़ें। लेकिन वह पश्चिम बंगाल में बोलपुर लोकसभा सीट से इंदिरा गांधी की इच्छा के विपरीत चुनाव लड़े और हार गए। तब इंदिरा गांधी उनसे बेहद नाराज हुईं, उन्हें डांट भी लगाई। प्रणब ने लिखा कि उन्होंने खुद से और बाकी सभी लोगों ने भी मान लिया था कि उन्हें सरकार में जगह नहीं मिलेगी। लेकिन इंदिरा की कैलकुलेटर में उन्हें जगह दी गई। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का निधन, जानें हर अपडेटहालांकि प्रणब दा के मन में यह टीस बनी रही। वे कभी चुनाव नहीं जीत पाते थे। इस प्रकार उनके कर्बी मजाक भी उड़ाते थे। लोकसभा का सांसद बनना उनके लिए एक सपना करने जैसा हो गया है। यह सपना 2004 आकर पूरा हुआ जब वह पहली बार चुनाव जीते। तब तक हर बड़ा मंत्रालय का पद संभालने वाले प्रणब दा लोकसभा चुनाव जीतकर खुशी के मारे फूट-फूट कर रोने लगे थे।उन्का लाेकशा जीत का सपना तो पूरा हो गया लेकिन एक और दबी हसरत प्रधानमंत्री बनने की थी। कहा जाता है कि 1984 के बाद जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो उनके उत्तराधिकारी के रूप में सबसे आगे उनका नाम आया, लेकिन राजीव गांधी ने चुना। प्रणब ने इस फैसले को स्वीकार किया तो किया लेकिन राजीव को स्वाभाविक नेता नहीं मान पाए, नतीजा हुआ कि प्रणब ने कांग्रेस को छोड़कर अपनी सरकार बना ली है। लेकिन बंगाल में उसने कोई प्रभाव नहीं छोड़ा। अंत में कांग्रेस में दोबारा घर वापसी की। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का निधन, कई दिनों से वेंटिलेटर परजब राजीव गांधी की हत्या हुई फिर भी उनके उत्तराधिकारी के रूप में उनका नाम आया, लेकिन पीएम बने नरसिंह राव। प्रणब मुखर्जी के बाद सालों में सोनिया गांधी के करीब ऐसा समय आया जब पार्टी वह हाशिए पर आ गई। लेकिन वह सबसे खराब समय में सोनिया के सलाहकार बने। 1998 से 2004 के बीच कांग्रेस को पटरी पर लाने के साथ सत्ता में आए। तब भी ऐसी चर्चा थी कि सोनिया प्रणब को पीएम के रूप में पेश कर सकते हैं। लेकिन फिर प्राब का सपना टूटता है। सभी को चाँकते हुए डॉ। मनमोहन सिंह पीएम बने।अपने करीबियों से बातों में उनकी पीएम न बन पाने की टीस सामने आ जाती थी। लेकिन इसे कभी कोई मुद्दा नहीं बनाया गया। यूपीए में उनक कद पीएम से कम बिल्कुल नहीं था। पार्टी और सरकार के बीच पुल का काम वही करते थे। सोनिया के संकटमोचक बने हुए थे। चाहे यूपीए -1 के दौरान विश्चासमत लेने का मसला हो या 2011 में अन्ना मूवमेंट से निबटने का मुद्दा, प्रणब ही सरकार-पार्टी को गाइड करते रहे ।2012 में प्रणब दा एक बार अपने घर पर मीडिया के साथ मिल रहे थे। तब तक उनके राष्टपति की उम्मीदवारी पर कांग्रेस गंभीर नहीं थी। तब उन्होंने मीडिया से कहा कि उन्हें घर छोटा ही चाहिए लेकिन राष्ट्रपति भवन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वहां वह मॉर्निंग वॉक अच्छे तरीके से कर लेंगे। यह पार्टी नेतृत्व को साफ संदेश था, जल्द हीउनकी उम्मीदवारी का ऐलान कर दिया गया था। तब कहा गया कि भले ही प्रब मुखर्जी एक राष्ट्रपति के रूप में बेहतर पसंद थे। लेकिन सक्रिय राजनीति से हटने का कांग्रेस को बड़ानुकान उठाना पड़ा। 2014 आम चुनाव में करारी हार के पीछे पार्टी में परिपक्व नेतृत्व का अभाव बताया गया। कहा जाता है कि प्रणब मुखर्जी के दिमाग के अंदर टेप रिकॉर्डर फिट होता था। अगर एक बात प्रणब मुखर्जी के सामने हो जाए तो कहते हैं मानो दिमाग में वह टेप हो गया है। नियम-कानून से लेकर सालों पुरानी दास्तां का, चलता-फिरता इनसाइक्लापेडिया माने जाते थे। 40 साल तक उन्होंने भी लिखी है। उन्होंने कहा था, इसके पेज उनके मरने के बाद प्रकाशित किए गए हैं। अब जब प्राब दा नहीं रहे, अब वे पृष्ठ भी सामने जाएंगे। अब उन पन्नों से राजनीति में दबी कई कहानियां प्रणब के निधन के बाद बच जाएगी, यह जल्द ही बताएगा। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी (फाइल फोटो)

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