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UN सुरक्षा परिषद में आज चुना जाएगा भारत, 8वीं बार होगा शामिल

भारत संयुक्त राष्ट्र के शक्तिशाली 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद में एक गैर-स्थायी सदस्य के रूप में शामिल होने के लिए तैयार है. भारत 2021-22 के कार्यकाल के लिए एशिया-प्रशांत श्रेणी से गैर-स्थायी सीट के लिए एकमात्र उम्मीदवार है.

  • भारत पहले भी 7 बार 2-2 साल के लिए चुना गया
  • 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद में 5 स्थायी सदस्य देश
  • भारत को चीन और पाक समेत 55 देशों का समर्थन

भारत को आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गैर स्थायी सदस्य के रूप में चुना जाएगा. भारत को उम्मीद है कि आज बुधवार को सुरक्षा परिषद चुनावों में उसे आसानी से जीत मिल जाएगी जो उसे 2021-22 के कार्यकाल के लिए गैर-स्थायी सदस्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र उच्च-तालिका में लाएगा. भारत पहली बार 1950 में गैर-स्थायी सदस्य के रूप में चुना गया था और आज आठवीं बार चुना जाएगा.

193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा में महासभा के 75वें सत्र के अध्यक्ष के लिए चुनाव के अलावा सुरक्षा परिषद के 5 गैर-स्थायी सदस्य और कोरोना महामारी के कारण लगी पाबंदियों की वजह से संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आर्थिक और सामाजिक परिषद के सदस्यों का भी चुनाव कराया जाएगा.

भारत संयुक्त राष्ट्र के शक्तिशाली 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद में एक गैर-स्थायी सदस्य के रूप में शामिल होने के लिए तैयार है. भारत 2021-22 के कार्यकाल के लिए एशिया-प्रशांत श्रेणी से गैर-स्थायी सीट के लिए एकमात्र उम्मीदवार है.

भारत को समर्थन हासिल

भारत की जीत इसलिए सुनिश्चित है क्योंकि क्षेत्र की एकमात्र सीट के लिए वह अकेला उम्मीदवार है. नई दिल्ली की उम्मीदवारी को सर्वसम्मति से पिछले साल जून में चीन और पाकिस्तान समेत 55 सदस्यीय एशिया-प्रशांत समूह द्वारा समर्थन किया गया था.

संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष तिजानी मुहम्मद-बंदे ने सोमवार को विभिन्न चुनावों के लिए उम्मीदवारों के नाम के साथ सदस्य देशों को एक पत्र जारी किया. अफ्रीकी और एशिया-प्रशांत देशों के बीच की 2 रिक्त सीटों के लिए, 3 उम्मीदवारों को सूचित किया गया है, जिसमें जिबूती, भारत और केन्या है.

इन 3 उम्मीदवारों में से भारत और केन्या समर्थित उम्मीदवार हैं. जबकि लैटिन अमेरिकी और कैरेबियन देशों के लिए रिक्त एक खाली सीट के लिए मैक्सिको का समर्थन किया गया है. जबकि पश्चिमी यूरोपीय और अन्य देशों के बीच की 2 रिक्त सीटों के लिए 3 उम्मीदवारों कनाडा, आयरलैंड और नॉर्वे का संचार किया गया था.

हर साल महासभा 2 साल के कार्यकाल के लिए 5 गैर-स्थायी सदस्यों (कुल 10 में से) का चुनाव करती है.

आखिरी बार 2011 में चुना गया भारत

10 गैर-स्थायी सीटें क्षेत्रीय आधार पर वितरित की जाती हैं जिसमें अफ्रीकी और एशियाई देशों के लिए 5; पूर्वी यूरोपीय देशों के लिए 1; लैटिन अमेरिकी और कैरेबियन देशों के लिए 2; और पश्चिमी यूरोपीय और अन्य देशों के लिए 2 सीट निर्धारित की गई है.

परिषद के लिए चुने जाने के लिए, उम्मीदवार देशों को महासभा में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्य देशों के मतपत्रों का दो-तिहाई बहुमत चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस त्रिमूर्ति कहते हैं कि सुरक्षा परिषद में भारत की मौजूदगी दुनिया में वसुधैव कुटुंबकम की धारणा को मजबूत करेगी.

इससे पहले, भारत को 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 1977-1978, 1984-1985, 1991-1992 और हाल ही में 2011-2012 में सुरक्षा परिषद के गैर-स्थायी सदस्य के रूप में चुना जा चुका है.

370 हटने और अक्साई चिन पर बयानों से सीमा पर हमलावर हो गया है चीन?

रक्षा विशेषज्ञ अभिषेक मतिमान ने आजतक से बातचीत में कहा कि आज हम चीन के विश्वासघात की बातें कह रहे हैं, लेकिन विश्वासघात तो ऐतिहासिक रूप से चीन करता ही आया है तो आज की तारीख में अगर हमें इसका अहसास हो रहा है तो हमसे देर हो गई है.

एलएसी पर दोनों देश की सेनाओं में हुई हिंसक झड़प (Photo: Getty Images)एलएसी पर दोनों देश की सेनाओं में हुई हिंसक झड़प (Photo: Getty Images)
 
  • रक्षा विशेषज्ञ अभिषेक मतिमान ने आजतक से की बातचीत
  • बोले- ऐतिहासिक रूप से चीन ही करता आया है विश्वासघात

क्या सीमा पर चीन के आक्रामक तेवरों की वजह धारा 370 का हटना है? क्या संसद में पीओके और अक्साई चिन को आजाद कराने जैसे बयानों से टेंशन में आ गया है चीन? लद्दाख में एलएसी यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के पास भारत का ढांचा खड़ा करना ड्रैगन को खतरे की घंटी लग रहा है? एक्सपर्ट की मानें तो इनका जवाब हां में है. वो आगाह भी करते हैं कि अगर भारत की ओर से इस तरह के बयान दिए जाते हैं और सीमा पर अपनी तैयारियां बढ़ाई जाती हैं तो चीन की ओर से उसके जवाब के लिए भी हमें तैयार रहना होगा.

रक्षा विशेषज्ञ अभिषेक मतिमान ने आजतक से बातचीत में कहा कि आज हम चीन के विश्वासघात की बातें कह रहे हैं लेकिन विश्वासघात तो ऐतिहासिक रूप से चीन करता ही आया है तो आज की तारीख में अगर हमें इसका अहसास हो रहा है तो हमसे देर हो गई है.

उन्होंने कहा कि चीन की तरफ से गलवान के बारे में जो बयान आया है वो आशा के अनुरूप ही है. अभी तक जो-जो चीजें पिछले कुछ हफ्तों में हुई हैं वो इस बात का सबूत हैं कि चीन कहता कुछ है और करता कुछ है. ये 1962 से ही चला आ रहा है.

1962 की लड़ाई में गलवान वैली तक चीनी आ गए थे

अभिषेक मतिमान ने कहा कि 1962 की लड़ाई में गलवान वैली तक चीनी आ गए थे, लेकिन युद्ध के समाप्त होने पर वो खुद पीछे उस जगह पर चले गए जहां अप्रैल तक वो थे क्योंकि गलवान घाटी में रहना उनके लिए उस समय मुश्किल था. अब जब वो घाटी में आए हैं, तो तैयारी के साथ आए हैं. मुश्किलों का सामना करते हुए वो वहां अपना बुनियादी ढांचा डवलप कर रहे हैं, तो उसके पीछे एक साफ मंशा है, वो वहां घूमने नहीं आए हैं, वो वहां हम पर हावी होने आए हैं. अभिषेक ने इसकी वजह भी बताई.

उन्होंने कहा कि हमारी तरफ से नेताओं ने, संसद में भी कुछ ऐसे बयान दिए थे कि 370 हटने के बाद पीओके और अक्साई चिन भी अपना है. इन चीजों का असर पड़ता है, दूसरे देश भी सुनते और देखते हैं कि किस तरह औपचारिक फोरम पर ऐसे बयान दिए जा रहे हैं. चीन की यही चिंता है. वो चिंतिंत है कि वहां हमारा ढांचा भी डवलप भी हो रहा है और हमारे यहां से ऐसे बयान भी जा रहे हैं तो उसके लिए हमें तैयार रहना पड़ेगा.

 

 

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